Friday, June 14, 2024

विकास के लिए जीवन में उथल-पुथल होना

 विकास के लिए जीवन में उथल-पुथल होना 


इन्सान और हिमालय में काफी समानताएं हैं। सबसे बड़ी समानता तो यही कि दोनों के भीतर अपने को चरम पर पाने की ललक अनवरत मौजूद रहती है। और इसी की जद्दोजहद इनके जीवन में तमाम तरह की उथल-पुथल लाती है। फिर भी दोनों रुकते नहीं हैं। दोनों की यही खूबी इन्हें एक-दूसरे के करीब भी लाती है और जोड़ती भी है। जैसे ही आप हिमालय के नजदीक पहुंचते हैं, वैसे ही इस धरती के सबसे युवा प्राणी यानी आप और सबसे युवा पर्वत श्रृंखला हिमालय के बीच एक रूमानियत की शुरुआत होने लगती है। दोनों ही अभी विकसित होने की प्रक्रिया में हैं, इसलिए दोनों ही अब भी बढ़ रहे हैं। अपने चरम को पाने की कोशिश में दोनों की यात्रा जारी है और यह चक्र कभी थमने वाला नहीं है। हालांकि हिमालय के लिए अपनी चोटी या चरम को छूना आसान नहीं है। अपने विकास के इस प्रयास में यह विशाल पर्वत रोज टूटता है और इससे बड़े-बड़े हिमस्खलन होते हैं, हिमनद बनते-टूटते हैं, लेकिन इन तमाम घटनाओं और अवरोधों के बावजूद इसकी यात्रा में ठहराव नहीं है। प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाली यह सारी अफरा-तफरी इस पर्वत श्रृंखला के बढ़ने और अपने चरम को छूने की कोशिशों का ही परिणाम है। यही बात मनुष्य के साथ भी देखने को मिलती है, जब भी कोई व्यक्ति आगे बढ़ने का प्रयास करता है, तो उसके जीवन में भी मुश्किलें आती हैं। यह बेहद सांकेतिक है। पर्वत श्रृंखला के बढ़ने से हर रोज भूचाल, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक घटनाएं देखने को मिलती हैं। ठीक ऐसा ही हाल इन्सान के जीवन का भी है, जब भी आप बढ़ना चाहेंगे, तो आपके जीवन में भूचाल आते रहेंगे और मुश्किलें आपका पीछा करती दिखेंगी। जो लोग निष्क्रिय होते हैं और बढ़ना नहीं चाहते, उनके जीवन में ठहराव और स्थायित्व आने लगता है। वैसे तो देखने में उनका जीवन औरों से बेहतर नजर आता है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। निष्क्रियता या कुछ नहीं करने की ललक जीवन को नीरस बना देती है। जीवन बेजान-सा हो जाता है। जो व्यक्ति अपने विकास के लिए निरंतर कोशिश करता है, उसके जीवन में उथल-पुथल तो होगी ही। और ऐसा होना जरूरी भी है, तभी इन्सान विकास के लिए प्रेरित होता है। हिमालय में पहला बड़ा हिम-स्खलन कोई पांच करोड़ साल पहले हुआ था। तब से अब तक यह पांच मिलीमीटर की रफ्तार से धीरे-धीरे हर साल उठ रहा है। हालांकि महाद्वीप पर इसका विस्तार चौड़ाई में भले ही पांच सेंटीमीटर प्रति वर्ष हो, लेकिन ऊंचाई के मामले में यह पांच मिलीमीटर की सालाना दर से ही बढ़ रहा है। जीवन के साथ भी हमेशा यही होता है। आप धरातल पर कितना भी कुछ कर लीजिए, लेकिन इससे ऊंचाई तो थोडी ही बढ़ेगी। यह सिद्धांत सब पर लागू होता है, फिर चाहे आप भौतिक सुख था
कल्याण की खोज में जुटे रहें

Sunday, June 9, 2024

सही मार्ग दिशा में की गई परिस्रम जरूर सफल बनाती है

 सही  मार्ग दिशा में की गई परिस्रम जरूर सफल बनाती है


जाहिर है कि योग्यता सफलता की गारंटी नहीं होती। हालांकि परंपरागत ज्ञान तो यही कहता है कि गणित एक ऐसा विषय है, जिसमें विद्यार्थी जितने ज्यादा प्रतिभावान होंगे, उनके सफल होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। वे कक्षा के उन साथियों को पीछे छोड़ देंगे, जो वास्तविकता में गणित के लायक नहीं है। ईमानदारी से कहूं तो स्कूल की शुरुआत मैंने भी इसी धारणा के साथ की थी। मैंने ऐसा समझ लिया था कि जो विद्यार्थी आसानी से बातें समझते हैं, वे अपने साथियों से आगे बने रहेंगे। स्कूल में पढ़ाने के दौरान प्रतिभा के विषय ने मेरा ध्यान विचलित कर दिया था। धीरे-धीरे मैंने खुद से कठिन सवाल पूछना शुरू कर दिया। मैंने कोई पाठ पढ़ाया और वह अवधारणा विद्यार्थियों को समझ नहीं आई, तो इसके क्या कारण हैं? क्या मुझे अपना तरीका बदलना पड़ेगा? बाद में सोचा कि शिक्षक होने के नाते क्या मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है? अब मैंने कमजोर विद्यार्थियों की आवाज बनने की ठान ली। वे अपनी पसंदीदा बातें

करते हुए खुल जाते थे। बास्केटबाल, गानों आदि पर उनसे खूब संवाद किया। जब हम लोग एक-दूसरे के साथ खुल गए तब कमजोर विद्यार्थियों की पेचीदगियां समझ आई। दरअसल सभी विद्यार्थी एकसमान प्रतिभावान नहीं होते। लेकिन सबमें कुछ न कुछ खासियत जरूर होती है। भले ही कोई विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर है, लेकिन यदि उसके अंदर सीखने की ललक और निष्ठा है, तो वह पहले से घोषित प्रतिभावान से आगे निकल सकता है। यह साबित किया मेरे एक विद्यार्थी डेविड लुओंग ने। वह एकदम शांत रहता था और कक्षा में एकदम पीछे बैठता था। वह ब्लैकबोर्ड पर सवाल हल करने के लिए बड़ी मुश्किल से आता था। लेकिन मैंने उसके अंदर एक बात देखी कि उसे जब भी कोई काम दिया गया, तो वह अच्छे से करता था। मैंने उसकी प्रतिभा का आकलन किया और तत्काल डेविड को विभाग प्रमुख के पास ले गई और कहा कि इसे उन विद्यार्थियों के ग्रुप में शामिल कीजिए जो तेज हैं। डेविड ने तेज बच्चों में पहुंचकर खुद को कुछ समय तक असहज महसूस किया, लेकिन मैंने उसकी जो खूबी पहचानी थी, उसने वैसा ही किया। वह परिस्थितियों से घबराया नहीं और उसने खूब मेहनत कर खुद को इस लायक बनाया कि वह अव्वल विद्यार्थियों की बराबरी कर सके। दरअसल शिक्षक का कर्तव्य होना चाहिए कि वे विद्यार्थी की खूबी को पहचानकर आगे बढ़ें। डेविड एयरोस्पेस कॉरपोरेशन में इंजीनियर बनने के बाद मुझसे मिला, उसने बताया कि यदि आप मुझे अपनी कक्षा से निकालकर तेज विद्यार्थियों के ग्रुप में शामिल नहीं करवातीं, तो मैं यहां तक नहीं पहुंचता। जाहिर है, प्रतिभावान होना अच्छा है, लेकिन सही दिशा में की गई मेहनत आपको जरूर सफल बनाती है।

किसी को कभी दुःख मत देना,

 किसी को कभी दुःख मत देना,

 क्योंकि दी गई चीख एक दिन हजार गुणा होकर लौटती है।

क्या खूब कहा है किसी ने, कि किसी के सुख का कारण बनो, भागीदार नहीं और दुःख में भागीदार बनो, कारण नहीं।
किसी के बहुत सताने पर भी उसे सताने का प्रयास नहीं करना चाहिए, क्योंकि दुःखी प्राणी का शोक ही सतानेवाले का नाश कर देता है।
जिस दिन हम ये समझ जाएँगे कि सामनेवाला गलत नहीं है और सिर्फ उसकी सोच हमसे अलग है, उस दिन जीवन से दुःख समाप्त हो जाएँगे।
जिस तरह से थोड़ी सी औषधि भयंकर रोगों को शांत कर देती है, उसी तरह ईश्वर की थोड़ी सी स्तुति बहुत से कष्ट और दुःखों का नाश कर देती है।
जिसके साथ बात करने से ही खुशी दुगुनी और दुःख आधा हो जाए, वो ही अपना है, बाकी तो बस दुनिया ही है।
सुख और दुःख अपने नसीब से मिलता है और अमीरी-गरीबी से इसका कोई लेना-देना नहीं है, रोनेवाले महलों में भी रोते हैं और किस्मत में खुशियाँ हों तो झोंपड़ी में भी हँसी गूँजती है।
सभी को सुख देने की क्षमता भले ही आपके हाथ में न हो, किंतु किसी को हमारी
वजह से दुःख न पहुँचे, यह तो आपके हाथ में ही है।
दुःख को सुख में बदलते रहिए, धीरे-धीरे ही सही, चलते रहिए।
दुःख में स्वयं की एक उँगली आँसू पोंछती है और सुख में दसों उँगलियाँ बजती हैं। जब स्वयं का शरीर ही ऐसा करता है तो दुनिया से क्या गिला शिकवा करना ! अतः हँसते रहिए, हँसाते रहिए और सबका भला करते रहिए।
दुःख किसी के व्यवहार से उतना नहीं, जितना अपनी सोच से है। अपनी सोच बदलिए, दुःख अगर किसी कारणवश खत्म नहीं तो कम जरूर हो जाएगा।
दुःख भोगनेवाला तो आगे सुखी हो सकता है, लेकिन दुःख देनेवाला कभी सुखी नहीं हो सकता।
दुःख उधार का है, आनंद स्वयं का है। आनंदित तो अकेले भी हो सकते हैं;

दुःखी होना चाहें तो दूसरे की जरूरत है। कोई धोखा दे गया, किसी ने गाली दे दी, कोई तुम्हारे मन के अनुकूल न चला-सब अनुकूलता दुःख दूसरे से जुड़े हैं और आनंद

Friday, June 7, 2024

चिंताओं में बर्बाद न करें कीमती पल

 चिंताओं में बर्बाद न करें कीमती पल


मन जब विश्राम में होता है, तो बड़े चैन में रहता है। उस वक्त आप आंतरिक सुख का अनुभव करते हैं और शरीर को भी आराम मिलता है। विश्राम में रहने से शरीर स्वस्थ रहता है। जीवन के कीमती पलों को या तो चिंताओं में बर्बाद कर सकते हैं या इस प्रकार से जी सकते हैं कि हम अपने अंतर में बेफिक्र रहें। जीवन में जब भी कोई कठिन परिस्थिति आती है, तो उसका सामना न करना पड़े, इस बारे में सोचते रहते हैं। इस व्यर्थ की सोच में आपकी ऊर्जा नष्ट होती है। इससे सुख-चैन जाने के साथ ही स्वास्थ्य का भी बड़ा नुकसान होता है। काश! आप समझ पाते कि आपका स्वास्थ्य आपके हाथ में है। आपके शरीर की उत्पत्ति और आपके शरीर का आकार एवं रूप आपके मन की वजह से बना है। ऐसा नहीं है कि शरीर पहले बना और फिर मन उसमें आया। जैसे, पहले मिट्टी का एक बर्तन बनाया, फिर उसमें हमने पानी भर दिया, ऐसा नहीं है। कई लोगों का ऐसा मानना है कि शरीर में से मन निकला है, पर यह संभव नहीं। आप कार खरीदने जाते हैं, तो दस शो-रूम में जाते हैं, इंटरनेट पर सर्किंग करते हैं, दस लोगों से राय लेते हैं कि कौन-सी गाड़ी अच्छी है? किस का इंजन अच्छा है? किस की एयरकंडीशनिंग अच्छी है? अगर आप युवा हैं, तो आपको सबसे ज्यादा इस बात की फिक्र होगी कि गाड़ी दिखने में कैसी है और अगर आप थोड़ा पौरुष दिखाना चाहते हैं, तो फिर आपका दूसरा सवाल होगा कि इंजन की क्षमता कितनी है? आप कहेंगे कि गाड़ी के आकार को मारो गोली, इंजन की क्षमता के बारे में बताइए कि हाईवे पर यह कितनी तेज दौड़ेगी? देखिए, यह भी उम्र का तकाजा होता है और आपकी रुचि बदलती रहती है। जवानी में पूछता रहता है कि इंजन की स्पीड कितनी है? और यही जब बूढ़ा हो जाएगा, तब पूछेगा, सीट बेल्ट ठीक से बंद होती है न? कहीं जोर से ब्रेक लगे और मैं गिर न जाऊं ! शरीर की चिंता हो जाती है। अब उसकी फिक्र तेज दौड़ने वाली गाड़ी की नहीं होती। अब उसकी फिक्र होती है कि सस्ती और मजबूत गाड़ी होनी चाहिए। खुदा-न-खास्ता, अगर कोई दुर्घटना हो, तो मैं अंदर बैठा सलामत रहूं। आप कार खरीदते हैं, तो इतना सोचते हैं। चंपा या रजनीगंधा का एक फूल कमरे में रख देने से पूरा कमरा खुशबू से भर जाता है। अब उस कमरे में पचास लोग आ जाएं, तब भी हमें यह नहीं कहना पड़ेगा कि पचास लोगों ने खुशबू ली, इसलिए खुशबू खत्म हो गई। खुशबू अभी भी वहीं पर है और पांच सौ लोग भी आकर चले जाएं, तब भी वह अपनी जगह पर बनी रहेगी। इस खुशबू का जो स्रोत है, वह यह छोटा-सा फूल है। अब इसको यों समझें, आपका मन खुशबू भी है और फूल भी है। मन अदृश्य है, यानी आप सुगंध को अपनी आंखों से देख नहीं सकते, हाथ से छू नहीं सकते, सिर्फ सूंघ सकते हैं, लेकिन फूल आंखों से दिखता है। हम यों, कह सकते हैं कि आपका शरीर तो दिखता है, पर इस शरीर में मौजूद मन दिखता 

Wednesday, June 5, 2024

आपके अनुमान गलत हैं!

 



आपके अनुमान गलत हैं!

हम सभी अनुमान लगाने में बहुत बुरे होते हैं। हम सोचते हैं कि हम यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि किसी चीज़ में कितना समय लगेगा, जबकि हमें दरअसल ज़रा भी पता नहीं होता। हम हर चीज़ को सर्वश्रेष्ठ परिदृश्य के अनुसार होते देखते हैं और उन विलंबों पर विचार नहीं करते, जो अवश्यंभावी रूप से हमेशा टपक पड़ते हैं। वास्तविकता कभी सर्वश्रेष्ठ परिदृश्यों के अनुसार नहीं होती।
इसीलिए जो अनुमान भविष्य में कई सप्ताह, महीने और वर्ष आगे तक के होते हैं, वे 
 फंतासियाँ होती हैं। सच तो यह है कि आप नहीं जानते कि भविष्य में इतनी दूरी पर क्या होने वाला है।
आप कितनी बार सोचते हैं कि किराना स्टोर की फटाफट यात्रा में आपको कुछ मिनट लगेंगे, जबकि आपको एक घंटा लग जाता है? और याद करें, जब अटारी की सफ़ाई में आपको पूरा दिन लग गया था, हालाँकि इसे शुरू करते समय आपने सोचा था कि इसमें बस दो घंटे लगेंगे? या कई बार इसका विपरीत होता है, जैसे जब आपने आँगन की सफ़ाई चार घंटे तक करने की योजना बनाई थी, लेकिन यह केवल पैंतीस मिनट में ही हो गई थी। हम इंसान अनुमान लगाने में बहुत बुरे होते हैं।
इन सरल कामों में भी हमारे अनुमान दोगुने या इससे ज़्यादा बुरे साबित होते हैं। अगर कम कुछ घंटों का अनुमान सटीकता से नहीं लगा सकते, तो हम "छह महीने के प्रोजेक्ट" की लंबाई की सटीक भविष्यवाणी करने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
इसके अलावा, जब हम यह अंदाज़ा लगाते हैं कि किसी चीज़ में कितना समय लगेगा, तो हम थोड़े से ग़लत नहीं होते - हम बहुत ज़्यादा ग़लत होते हैं। 

आपके सर्वेसर्वा में असीम संभावना छिपी है

 आपके सर्वेसर्वा में असीम संभावना छिपी है


जेन बौद्ध धर्म हमें सिखाता है कि जीवन को कहीं अधिक सहजता और मुक्त भाव से जीने के लिए, हमें इस शिक्षा का महत्त्व समझना होगा कि स्वयं को इस या उस तरह के व्यक्ति के रूप में पहचान नहीं दें।

मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूँगा।
आपके भीतर भी एक और आप हैं। आपका यह संस्करण आपसे कहीं अधिक मुक्त और संभावना से भरपूर है। यह आपका अनिवार्य अस्तित्व है। आपके भीतर ही आपका सच्चा नायक या सर्वेसर्वा रहता है।

ज़ेन में, सर्वेसर्वा को “मास्टर” भी कहते हैं। एक ज़ेन भिक्षु की प्रसिद्ध कथा कही जाती है जो स्वयं को संबोधित करता था, "हे मास्टर!" और उसका स्व अंदर से जबाब देता था, "जी!” फिर वह पूछता, "क्या तुम जाग्रत हो?" तब उसका स्व उत्तर देता, "हाँ!” वह प्रायः इस तरह का प्रश्न पूछता और उसे उत्तर मिलता।

हम सभी समाज में विविध भूमिकाएँ निभाते हैं। आप किसी ऑफ़िस में कर्मचारी, माँ या फिर रेस्त्राँ में कुक हो सकते हैं। बेशक़, ये सब हमारे विविध रूप ही हैं। परंतु हमारे पास एक और अस्तित्व या स्व भी होता है, वह सच्चा नायक हमारे भीतर रहता है।
इस अन्य अस्तित्व को जाग्रत करने के लिए अपनी ओर से बेहतरीन प्रयत्न करें। 

Saturday, June 1, 2024

स्क्रिप्ट आपकी असीमित ज़िंदगी की

 स्क्रिप्ट आपकी असीमित ज़िंदगी की


जब अपनी कहानी को बदलना शुरू करें तो यह भी सीखिए आप दूसरों की बदलती कहानियों को स्वीकार करेंगे और उनका हिस्सा बनेंगें। कहानियाँ एक-दूसरों को काटती हैं, एक-दूसरे में उलझती है, एक-दूसरे को सुलझाती हैं। जैसे पानी की दो दूँदें दो जगहों पर गिरने के बाद एक- दूसरे से जुड़ जाती हैं, वैसे ही कहानी जब बनती हैं तो विस्तार के साथ एक-दूसरे का हाथ पकड़ती हैं, गले लगाती हैं। साथ में बढ़ना सीखिए, जैसे बढ़ते हैं जंगल, बनते हैं समंदर, बसते हैं शहर।
ज़िंदगी हर एक पल में एक नई शुरुआत है जो बीत गई वह और थी अब नई एक बात है चंद लम्हों के सफर को ज़िंदगी कहते हैं लोग कुछ धीमे कटते दिन हैं, एक लंबी रात है हाथ थामे आपका, गर आप ही चलते रहेंगे कुछ अजनबी भी राह में प्यार से मिलते रहेंगे ख़्वाब आँखों में लिए, दिल में उमंगे पालकर एक हसीन एहसास, ज़िंदगी ढेर से जज़्बात हैं एक बदली हुई कहानी का, नया किरदार बनिए नफ़रतों को भूल कर, इश्क़ बनिए, प्यार
बनिए क्या पता कल किस मोड़ पर, क्या छूट जाए भीड़ में चलते हुए, ख़ुद से हसीन मुलाक़ात है ज़िंदगी हर एक पल में एक नई शुरुवात है



विद्यार्थियों की शक्ति

जब विद्यार्थियों की अचानक शक्ति आपको


लगे कि आपके पास कुछ नहीं है, कोई अनुभव नहीं है, संपर्क नहीं है, बिल्कुल पैसा नहीं है, उस समय याद रखें कि आपके पास ये सबसे बड़ी शक्ति है। वे की शक्ति ! तब तक, बार-बार, जब तक आपको हाँ में जवाब न मिल जाए। मुझे अपना बिज़नेस शुरू करने के लिए पुंजी की ज़रूरत थी। मैंने अपने पिता से पैसा माँगा और वो सहमत भी हो गए। अब मेरे पास अपनी पुँजी थी, अपना उत्पाद था और मैं उस उत्पाद के सभी मानकों पर परीक्षण भी कर चुका था। मैंने सोचा, ठीक है, मेरा उत्पाद पहले ही घरों के लिए है, यानी सब कुछ सही रास्ते पर है और ठीक जा रहा है। अब सवाल यह था कि मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिससे मेरा उत्पाद बच्चों से भी जुड़ जाए? मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ कि दोनों समूह जुड़ जाएँ। छोटे बच्चों को मीठी चीजें पसंद होती हैं, इसलिए मैंने बर्तन धोने वाले जेल को मिठाई की तरह महक बनाने का फैसला किया। मैंने फलों का गुड़ा और मीठे नींबू की सुगंध उसमें मिलाई। मुझे विश्वास था कि बच्चे इसे पसन्द करेंगे और घरणियाँ भी इसे पसन्द करेंगी। अपने उत्पाद की बिक्री के लिए यही मेरा आधार था। मैं कारोबार में सबसे ज्यादा मुनाफा तो दे ही रहा

था, अब बच्चों और गृहणियों को मेरी आदतें स्पष्ट थीं। समय विचार भी
आप अपने समग्र अनुभव का मूल्यांकन कैसे

Thursday, May 30, 2024

अच्छे जीवन की पहली शर्त है सीखते रहना

 अच्छे जीवन की पहली शर्त है सीखते रहना


'जेन' का अर्थ है करुणा की भावना यानी दूसरों की भलाई के बारे में सोचना। जहां करुणा होगी, वहीं मनुष्य है। यदि किसी के पास 'जेन' है, तो इसका मतलब है कि उसमें गुण हैं, दूसरों के कल्याण के लिए अच्छी भावनाएं हैं। और किसी के पास गुण होने का मतलब यह है कि वह अच्छा जीवन जीने की सबसे पहली आवश्यक शर्त तक पहुंच गया है। यह शर्त इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि जब तक हम किसी के बारे में अच्छी भावना, अच्छा विचार नहीं रखेंगे, तो उसके कल्याण के बारे में सोच कैसे पाएंगे! दूसरों के कल्याण के बारे में सोचना ही मनुष्य होने का पहला प्रमाण है। इसलिए समाज के भीतर और अपने सामाजिक संबंधों के दायरे में सबसे पहले 'जेन' को लाना होगा। यही ऐसी पहली शर्त या अवधारणा है, जो हमें एक अच्छे जीवन की ओर प्रवृत्त करती है, और अच्छे जीवन से ही अच्छे समाज का निर्माण होता है।
मनुष्य को 'जेन' को आत्मसात करते हुए ही अपनी हर गतिविधि को परोपकार, कर्तव्य, अंतर्ज्ञान और विश्वास जैसे गुणों के अनुसार संचालित करना चाहिए। इसी से हर व्यक्ति अपने गुणों की कसौटी पर खरा उतर सकता है और अच्छे जीवन का रस ले सकता है। अच्छा जीवन जीने के लिए सद्‌गुणों का विकास कैसे करें? अपने भीतर सद्‌गुणों का विकास करना न
तो कठिन है, न असंभव। यह तो एक प्रक्रिया है, जिससे हमें गुजरना होता है। सबसे पहले हमें अपने को सीखने की प्रक्रिया में लाना होगा। सीखने का यह प्रयास व्यापक स्तर पर होना चाहिए। साथ ही, एक ईमानदार और ठोस लक्ष्य रखना होगा और फिर आत्म-प्रयोग के साथ यह चिंतन करना होगा कि मैं जो कर रहा हूं, उसमें कितनी ईमानदारी और सच्चाई है? जो लक्ष्य मैंने निर्धारित किया, क्या उसी दिशा में मैं सही-सही बढ़ रहा हूं? अगर 'वाकई हम इस सच्चाई पर खरे उतरते हैं, तो हम सद्गुण की दिशा में बढ़ रहे होते हैं। सद्गुण इसी दिशा में है। इसीलिए सीखने के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण सद्गुण के केंद्र में होता है, जिसके पास जितना ज्यादा ज्ञान होगा, वह सदगुण के उतना ही करीब होगा। सीखना हर जगह और हर चीज का हिस्सा होना चाहिए। सीखने की निरंतर प्रक्रिया ही अच्छे जीवन की पहली शर्त है। सीखने के प्रति प्यार के बिना अगर परोपकारी बनने का प्यार है, तो यह एक मूर्खतापूर्ण
सरलता की ओर ले जाता है। सीखने के बिना जानने का प्रेम है, तो इससे मन नष्ट हो जाता है। सीखने के प्यार के बिना सीधेपन का प्यार अशिष्टता और पाखंड की ओर ले जाता है.। जो व्यक्ति जितना अधिक सीखता है, उतना ही उसका जीवन अच्छा होता है। अच्छा जीवन और समाज, दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। लोगों का
जीवन अच्छा होगा, तो अच्छे समाज का निर्माण होगा और जब समाज अच्छा

Saturday, May 25, 2024

विचारधारा की शक्ति

 मनुष्य ही प्रकृति की सभी शक्तियों का स्वामी है





मेरे लिए मानव से परे विचारों का कोई अस्तित्व नहीं है। मेरे नजदीक मानव औरएकमात्र मानव ही सभी वस्तुओं और विचारों का निर्माता है। वही चमत्कार करताहै और वही प्रकृति की सभी शक्तियों का भावी स्वामी है। हमारे इस संसार में जो

भी सुंदर है, उसका निर्माण मानव श्रम, और उसके कुशल हाथों ने किया है। मैं मनुष्य को इसलिए प्रणाम करता हूं कि इस संसार में मुझे कोई ऐसी चीज नहीं दिखाई देती, जो उसके विवेक, उसकी कल्पनाशक्ति, उसके अनुमान का साकार रूप न हो। ईश्वर ने मनुष्य को अपने आकार और अपनी समानता के अनुसार बनाया है। यदि मनुष्य उसके जैसा है, तो वह मनुष्य के समान है। हमारा यही भाव होना चाहिए कि दूसरों को खुशी दे सकें। हम तब तक खुशी की कीमत नहीं समझते, जब तक कि वह हमारे पास होती है, लेकिन जैसे ही यह हमसे दूर हो जाती है, तब हमें इसका महत्व समझ में आता है कि यह कितनी कीमती है। हमारी आत्मा में जो अच्छा गुण है, वह कला की वजह से है। कला की शक्ति से हम अच्छे गुणों को सफलतापूर्वक जागृत करते हैं। जैसे-विज्ञान दुनिया की बुद्धि है, उसी तरह से कला उसकी आत्मा है। मेरा खुद का जीवन बड़े ही संघर्षों में बीता। चार वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। फिर मां छोड़कर चली गई। नाना ने भी अपने घर से निकाल दिया। मैंने रसोइए का काम किया। वहीं स्मिडरी नामक एक व्यक्ति मिले। उन्होंने पूछा, तुम पढ़ना-लिखना जानते हो? मैंने कहा, कभी मौका ही नहीं मिला। उन्होंने मुझे पढ़ना-लिखना सिखाया। यहीं से मेरी लेखन यात्रा शुरू हुई और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बचपन से कई कठिनाइयों का सामना किया, कई लोगों ने मुझे कष्ट दिया। स्वाभाविक है कि मैं उनसे नफरत भी कर सकता था, लेकिन नहीं। क्योंकि प्यार ही जीवन की जननी है, नफरत नहीं। मनुष्य के पास अच्छाई होती है, लेकिन वह कभी-कभी अपने बुरे स्वभाव को भी प्रकट कर देता है। केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए न्याय और समानता की मांग करना ठीक नहीं। हमारा प्रयास सदैव दूसरों की भलाई के लिए ही होना चाहिए। एक बात और, आदमी को किताबें पढ़ते रहना चाहिए। लेकिन यह याद रखें कि किताब सिर्फ किताब ही होती है। हमें अपने बारे में भी सोचना सीखना चाहिए। सांस्कृतिक विकास मानवीय और सभ्य समाज बनाने के लिए आवश्यक है। इन्सान को जब सबकुछ आसान लगता है, तो वह जल्द बेवकूफ बन जाता है। मनुष्य की सच्ची ताकत उसकी शारीरिक शक्ति में नहीं, बल्कि भावनाओं और आवेगों को नियंत्रित करने की क्षमता में निहित होती है। दूसरों पर हावी होने के बजाय खुद को भावनात्मक रूप से नियंत्रित करने, व्यक्तिगत विकास और समग्र कल्याण के प्रयास करते रहना चाहिए। वास्तव में, जीने का अर्थ लगातार सीखना और बढ़ना है, कभी भी सामान्यता या ठहराव के लिए समझौता नहीं करना है। उत्कृष्टता की निरंतर खोज के जरिये हम अपनी क्षमता का पूरी तरह से पता लगा सकते हैं।

विकास के लिए जीवन में उथल-पुथल होना

  विकास के लिए जीवन में उथल-पुथल होना  इन्सान और हिमालय में काफी समानताएं हैं। सबसे बड़ी समानता तो यही कि दोनों के भीतर अपने को चरम पर पाने ...